अनादि काल से अद्यावधि पर्यन्त चल रहे धर्म का नाम सनातन है हम सब सनातनी हैं। सनातन धर्म के संरक्षण संवर्धन हेतु हमारे ऋषि महर्षि दधीचि जी ने तो अस्थियों तक का भी दान कर दिया। हम सब सनातनी ऋषियों की संताने हैं, अतः उनके द्वारा सुख शांति समृद्धि के पथ को जीवन में उतारकर परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। वर्णाश्रम धर्म रक्षा, वैदिक शिक्षा, समाज में कुरीति को हटा संस्कृति का पाठ पढ़ाना, सोलह संस्कारों को समाज में जागृति करना, आयुर्वेद विधा से शारीरिक कष्ट निवृत्त करना, उपासना व ध्यान से मानसिक दुख निवृत्त करना, निर्धनों की सहायता करना, प्रकृति का संरक्षण संवर्धन करना, भारतीय संस्कृति की मूल आधार वेद लक्षणा गौ माता की सेवा करना, प्राकृतिक आपदा में सहयोग करना, आदिवासी क्षेत्र में बालकों हेतु शिक्षा चिकित्सा भोजन व आवास की समुचित व्यवस्था करना, नर्मदा परिक्रमावासी हेतु भोजन वस्त्र की सेवा से संतुष्ट करना, भ्रूण हत्या जैसे महाअपराध के फल को समाज में बताना, कृषि क्षेत्र में बिना यूरिया खाद से फसल उगाना, ग्रहों के शमन हेतु नक्षत्र ग्रह वाटिका का निर्माण करना, अनाथ दीन दुखी कन्याओं का परिणय संस्कार करवाना, संस्थान सेवा कर रहा है। संस्कृत व संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु देश के विभिन्न प्रदेशों में संस्कृत विद्यालयों का संचालन। जिसमें बेसिक व प्रौढ़ शिक्षा प्रदान की जा रही है । चरित्र निर्माण हेतु समाज में जागरूकता अभियान, मानव के भौतिक एवं मानसिक कष्टों का निवारण, ज्ञान योग – भक्ति योग – कर्म योग विषयक प्रशिक्षण, सोलह संस्कारों का विशेष प्रशिक्षण, संस्थान कर रहा है। धर्म सम्राट श्री जी महाराज द्वारा संस्थापित वेद शास्त्रानुसन्धान केंद्र में वेद वेदांग पुराण स्मृति धर्मशास्त्र रामायण महाभारत धर्म सम्राट साहित्य का अनुशीलन कराया जा रहा है। देश में धर्मपरक उद्घोष, यज्ञसंस्कृति व संस्कार महाराज श्री की कृपानिधि है।

समय – समय पर आर्ष ग्रंथ आधारित ग्रंथों का प्रकाशन भी समाज जागृति हेतु होता रहता है।

तीर्थराज प्रयाग में प्रतिवर्ष 1 मास पर्यन्त ऋषि महर्षि की परंपरा का अनुकरण करता हुआ कल्पवास का आयोजन धूमधाम के साथ संस्कृति का परिचय देता हुआ संपादित होता है।
महाकुंभ के पावन अवसरों पर विशालतम शिविर का आयोजन, उसमें भी यज्ञसंस्कृति पूरे कुंभ का एकमात्र मूल केंद्र होती है। पूरे विश्व में सुख शांति समृद्धि प्रदायिका, दु:ख दारिद्रय निवारिका यज्ञ संस्कृति है। अत: कुंभ जैसे पावन अवसरों पर विशाल लक्षचंडी जैसे महायज्ञ अपने आप में परिपूर्ण पुरुषोत्तम की कृपा का फल प्रत्यक्ष है।